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Juz 14 Page 265 / 604 Hizb 27

Ayah meanings

Muhammad Farooq Khan & Muhammad Ahmed

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Muhammad Farooq Khan and Muhammad Ahmed · Tanzil Project · Version tanzil-2026-09-21

  1. 52

    जब वे उसके यहाँ आए और उन्होंने सलाम किया तो उसने कहा, "हमें तो तुमसे डर लग रहा है।"

  2. 53

    वे बोले, "डरो नहीं, हम तुम्हें एक ज्ञानवान पुत्र की शुभ सूचना देते है।"

  3. 54

    उसने कहा, "क्या तुम मुझे शुभ सूचना दे रहे हो, इस अवस्था में कि मेरा बुढापा आ गया है? तो अब मुझे किस बात की शुभ सूचना दे रहे हो?"

  4. 55

    उन्होंने कहा, "हम तुम्हें सच्ची शुभ सूचना दे रहे हैं, तो तुम निराश न हो"

  5. 56

    उसने कहा, "अपने रब की दयालुता से पथभ्रष्टों के सिवा और कौन निराश होगा?"

  6. 57

    उसने कहा, "ऐ दूतो, तुम किस अभियान पर आए हो?"

  7. 58

    वे बोले, "हम तो एक अपराधी क़ौम की ओर भेजे गए है,

  8. 59

    सिवाय लूत के घरवालों के। उन सबको तो हम बचा लेंगे,

  9. 60

    सिवाय उसकी पत्नी के - हमने निश्चित कर दिया है, वह तो पीछे रह जानेवालों में रहेंगी।"

  10. 61

    फिर जब ये दूत लूत के यहाँ पहुँचे,

  11. 62

    तो उसने कहा, "तुम तो अपरिचित लोग हो।"

  12. 63

    उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हम तो तुम्हारे पास वही चीज़ लेकर आए है, जिसके विषय में वे सन्देह कर रहे थे

  13. 64

    और हम तुम्हारे पास यक़ीनी चीज़ लेकर आए है, और हम बिलकुल सच कह रहे है

  14. 65

    अतएव अब तुम अपने घरवालों को लेकर रात्रि के किसी हिस्से में निकल जाओ, और स्वयं उन सबके पीछे-पीछे चलो। और तुममें से कोई भी पीछे मुड़कर न देखे। बस चले जाओ, जिधर का तुम्हे आदेश है।"

  15. 66

    हमने उसे अपना यह फ़ैसला पहुँचा दिया कि प्रातः होते-होते उनकी जड़ कट चुकी होगी

  16. 67

    इतने में नगर के लोग ख़ुश-ख़ुश आ पहुँचे

  17. 68

    उसने कहा, "ये मेरे अतिथि है। मेरी फ़ज़ीहत मत करना,

  18. 69

    अल्लाह का डर ऱखो, मुझे रुसवा न करो।"

  19. 70

    उन्होंने कहा, "क्या हमने तुम्हें दुनिया भर के लोगों का ज़िम्मा लेने से रोका नहीं था?"

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