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Juz 17 Page 326 / 604 Hizb 33

Ayah meanings

Muhammad Farooq Khan & Muhammad Ahmed

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Muhammad Farooq Khan and Muhammad Ahmed · Tanzil Project · Version tanzil-2026-09-21

  1. 45

    कह दो, "मैं तो बस प्रकाशना के आधार पर तुम्हें सावधान करता हूँ।" किन्तु बहरे पुकार को नहीं सुनते, जबकि उन्हें सावधान किया जाए

  2. 46

    और यदि तुम्हारे रब की यातना का कोई झोंका भी उन्हें छू जाए तो वे कहन लगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! निस्संदेह हम ज़ालिम थे।"

  3. 47

    और हम बज़नी, अच्छे न्यायपूर्ण कामों को क़ियामत के दिन के लिए रख रहे है। फिर किसी व्यक्ति पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा, यद्यपि वह (कर्म) राई के दाने के बराबर हो, हम उसे ला उपस्थित करेंगे। और हिसाब करने के लिए हम काफ़ी है

  4. 48

    और हम मूसा और हारून को कसौटी और रौशनी और याददिहानी प्रदान कर चुके हैं, उन डर रखनेवालों के लिए

  5. 49

    जो परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते है और उन्हें क़ियामत की घड़ी का भय लगा रहता है

  6. 50

    और वह बरकतवाली अनुस्मृति है, जिसको हमने अवतरित किया है। तो क्या तुम्हें इससे इनकार है

  7. 51

    और इससे पहले हमने इबराहीम को उसकी हिदायत और समझ दी थी - और हम उसे भली-भाँति जानते थे। -

  8. 52

    जब उसने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "ये मूर्तियाँ क्या है, जिनसे तुम लगे बैठे हो?"

  9. 53

    वे बोले, "हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की पूजा करते पाया है।"

  10. 54

    उसने कहा, "तुम भी और तुम्हारे बाप-दादा भी खुली गुमराही में हो।"

  11. 55

    उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास सत्य लेकर आया है या यूँ ही खेल कर रहा है?"

  12. 56

    उसने कहा, "नहीं, बल्कि बात यह है कि तुम्हारा रब आकाशों और धरती का रब है, जिसने उनको पैदा किया है और मैं इसपर तुम्हारे सामने गवाही देता हूँ

  13. 57

    और अल्लाह की क़सम! इसके पश्चात कि तुम पीठ फेरकर लौटो, मैं तुम्हारी मूर्तियों के साथ अवश्य् एक चाल चलूँगा।"

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