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Juz 29 Page 581 / 604 Hizb 58

Ayah meanings

Muhammad Farooq Khan & Muhammad Ahmed

हिन्दी

Muhammad Farooq Khan and Muhammad Ahmed · Tanzil Project · Version tanzil-2026-09-21

  1. 20

    क्या ऐस नहीं है कि हमने तुम्हे तुच्छ जल से पैदा किया,

  2. 21

    फिर हमने उसे एक सुरक्षित टिकने की जगह रखा,

  3. 22

    एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक?

  4. 23

    फिर हमने अन्दाजा ठहराया, तो हम क्या ही अच्छा अन्दाज़ा ठहरानेवाले है

  5. 24

    तबाही है उस दिन झूठलानेवालों की!

  6. 25

    क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को समेट रखनेवाली बनाया,

  7. 26

    ज़िन्दों को भी और मुर्दों को भी,

  8. 27

    और उसमें ऊँचे-ऊँचे पहाड़ जमाए और तुम्हें मीठा पानी पिलाया?

  9. 28

    तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!

  10. 29

    चलो उस चीज़ की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे हो!

  11. 30

    चलो तीन शाखाओंवाली छाया की ओर,

  12. 31

    जिसमें न छाँव है और न वह अग्नि-ज्वाला से बचा सकती है

  13. 32

    निस्संदेह वे (ज्वालाएँ) महल जैसी (ऊँची) चिंगारियाँ फेंकती है

  14. 33

    मानो वे पीले ऊँट हैं!

  15. 34

    तबाही है उस झुठलानेवालों की!

  16. 35

    यह वह दिन है कि वे कुछ बोल नहीं रहे है,

  17. 36

    तो कोई उज़ पेश करें, (बात यह है कि) उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है

  18. 37

    तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की

  19. 38

    "यह फ़ैसले का दिन है, हमने तुम्हें भी और पहलों को भी इकट्ठा कर दिया

  20. 39

    "अब यदि तुम्हारे पास कोई चाल है तो मेरे विरुद्ध चलो।"

  21. 40

    तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!

  22. 41

    निस्संदेह डर रखनेवाले छाँवों और स्रोतों में है,

  23. 42

    और उन फलों के बीच जो वे चाहे

  24. 43

    "खाओ-पियो मज़े से, उस कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे हो।"

  25. 44

    निश्चय ही उत्तमकारों को हम ऐसा ही बदला देते है

  26. 45

    तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!

  27. 46

    "खा लो और मज़े कर लो थोड़ा-सा, वास्तव में तुम अपराधी हो!"

  28. 47

    तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!

  29. 48

    जब उनसे कहा जाता है कि "झुको! तो नहीं झुकते।"

  30. 49

    तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!

  31. 50

    अब आख़िर इसके पश्चात किस वाणी पर वे ईमान लाएँगे?

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